आजाद हिन्द फौज की कहानी – हिंदी PDF । By Purushotam Nagesh In Hindi PDF Free Download

आजाद हिन्द फौज की कहानी

आजाद हिन्द फौज की कहानी

लेखक पुरुषोत्तम नागेश ओक

द्वितीय भारतीय स्वतंत्रता समर

1943 to 1945

पुरुषोत्तम नागेश ओक खुद नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ आजाद हिंद फौज की कार्रवाई में भाग लिया था। वे लगभग 2 वर्षों तक नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ रहे। योगेश्वर दत्त मूलत महाराष्ट्र के रहने वाले थे। वे काफी शिक्षित थे।उस समय भी उनके पास m.a. और एलएलबी की डिग्रियां थी।उन्हें अंग्रेजी सरकार ने प्रलोभन देकर सैनिक के रूप में नौकरी दी थी। वो सिंगापुर मे

 जापान से युद्ध के दौरान बंदी बना लिए गए तथा बाद में जापानी सैन्य अधिकारियों द्वारा निर्मित हिकारी किकान विभाग में कैप्टन मोहन सिंह और लगभग साठ हजार अन्य भारतीय लोगों के साथ शामिल कर दिये गये जो मुख्यतः युद्ध में बनाए गए भारतीय बंदियों की देखभाल, प्रबंधन,उपयोग इत्यादि से जुड़ा था। हिकारी कीकान के पास भारतीय बंदियों से जुड़े हर फैसले की सर्वोच्चता थी।

बाद में कैप्टन मोहन सिंह को इसी विभाग का प्रमुख नियुक्त कर दिया गया जो आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता संघ और आजाद हिंद फौज के रूप में फला फूला।

पुस्तक : आज़ाद हिन्द फ़ौज की कहानी

लेखक : पुरुषोत्तम नागेश ओक

पुस्तक की भाषा : हिंदी

पेज : 383

इस पुस्तक में लेखक ने स्वयं के युद्ध के बंदी के रूप में प्राप्त अनुभव तथा आजाद हिंद फौज के कार्यप्रणाली का वर्णन किया है। इसमें लेखक ने विस्तृत से भारतीय बंदियों के साथ किए जाने वाले कार्य तथा अन्य बंदियों के साथ किए जाने वाले हैं व्यवहारों ,तत्कालीन राजनीति ,व भौगोलिक परिस्थितियों का बखूबी वर्णन किया है।

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लेखक बताता है जब उन्हें सिंगापुर में जापानी सैन्य कार्रवाई से बन्दी बना लिया जाता है तब उनके साथ किस तरह से व्यवहार किया जाता था। उन्हें कई हजारों के समूह में बांट दिया गया तथा छोटी छोटी छावनी में शिफ्ट कर दिया गया। जहां पर नाही खाने की व्यवस्था थी ,नाही स्वच्छ जल की,ना ही रहने की ,ना ही किसी अन्य प्रकार की सुविधाएं मौजूद थी।वे प्रायः रबड़ के जंगलों के बीच में छावनिया बनाते थे,जिससे शत्रु आसानी से आक्रमण ना कर सके।

वहां पर उन्हें बहुत कम ही भोजन मिलता था। कभी-कभी तो एक मैदे की रोटी तथा एक सब्जी या दाल ही परोसा जाता था।उन्हें किसी भी तरह के पोषक तत्व जैसे कि दूध,घी, दही ,सूखे फल इत्यादि बहुत कम मात्रा में उपलब्ध कराया जाता था। यद्यपि कभी-कभी उन्हें औटाये हुए दूध के डिब्बे दिए जाते थे जो नाकाफी थे। जिससे कई सैनिक बीमार हो जाते थे तथा कुछ की मृत्यु भी हो जाती थी। डॉक्टर और नर्सों की कोई समुचित व्यवस्था नहीं थी।

उन्हें प्रतिदिन कई मीलो तक चलना पड़ता था।कई कई बार उन्हें घंटों चलकर कैप्टन मोहन सिंह तथा अन्य सैन्य अधिकारियों के भाषण को सुनने के लिए मीलों दूर दूसरे छावनी में जाना पड़ता था और फिर वापस भी आना पड़ता था। यह क्रम कई महीनों तक चला ।

फिर कुछ दिनों बाद से उन्हें भारतीय स्वतंत्रता में भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाने लगा जिसमें कैप्टन मोहन सिंह की प्रमुख भूमिका थी उन्हें प्रेरित करने का क्रम भी कई महीनों तक चलता रहा मगर कोई खास निष्कर्ष नहीं निकला।

इस सबके बीच जापानी सेना ने सुदूर पूर्व के कई द्वीपों पर अपना अधिकार कर लिया था। उनके सैनिक बहादुर थे, खूंखार थे,तथा विजय की भावना से लबरेज थे ।वे जहां जहां जाते थे उसे जीत कर वहां पर अपनी सैन्य टुकड़ियों ,प्रशासनिक अधिकारियों ,राजनयिकों की नियुक्ति कर देते थे। जिससे कि वहां की समुचित कार्यप्रणाली उनके संपूर्ण कब्जे में आ जाए।जापानियों ने फिलीपींस, मलय, सिंगापुर,ब्रह्मदेश इत्यादि द्वीपों पर अपना अधिकार कर लिया था।

आजाद हिन्द फौज की कहानी In Hindi पुस्तक का विवरण :

8 दिसंबर 1941 को युद्ध प्राप्त करने के बाद जापानी सेना ने अति शीघ्रता से निम्न द्वीपों पर कब्जा कर लिया।

  • पेसिफिक महासागर का ग्वाम द्वीप 13 दिस
  • पेनांग द्वीप 20 दिस
  • वेक द्वीप 22 दिसंबर
  • हांगकांग 25 दिसंबर
  • फिलीपींस की राजधानी मनिला नगर 2 जनवरी 1942
  • मलय द्वीप 1 फरवरी
  • अंडमान निकोबार द्वीप समूह 23 मार्च को
  •  मांडले: ब्रह्मदेश बर्मा 1 मई को

इन सभी क्षेत्रों को जीतने के बाद जापानियों ने यहां पर रहने वाले लगभग 2500000 भारतीयों को संगठित करना शुरू किया।

 दूसरी तरफ द्वितीय विश्व युद्ध लडा़ जा रहा था  एक तरफ मित्र राष्ट्र थे जिसमें अमेरिका, ब्रिटिश,रूस आदि तथा दूसरी धुरी राष्ट्र जिसमें जर्मनी, इटली और जापान इत्यादि शामिल थे इस युद्ध में विश्व के लगभग समस्त देशों ने प्रतिभाग किया इसमें 100000000 से भी अधिक सैनिकों ने भाग लिया।

भारतीय स्वतंत्रता संघ के बनने के काफी समय बाद भी जापानी सरकार द्वारा इस पर कुछ विशेष ध्यान नहीं दिया गया अपितु इन भारतीय बंदियों का प्रयोग अपने महत्वाकांक्षी सीमा विस्तार के लिए किया। कुछ वर्षों बाद भारतीय स्वतंत्रता संघ ने जापानी सरकार से एक समझौता किया जिसमें उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस से मिलने की मांग को भी शामिल किया।

इसके बाद के अध्ययनों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आजाद हिंद फौज की स्थापना, रानी लक्ष्मीबाई वूमेन ब्रिगेड  के बारे में वर्णन किया गया है।किस तरह से नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जापान, इटली, हंगरी आदि देशों के साथ मिलकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ युद्ध का बिगुल बजाया। उन्होंने आजाद हिंद फौज के साथ भारत के उत्तर पूर्वी भाग बर्मा, रंगून,म्यानमार के रास्ते इंफाल और कोहिमा के समीप अंग्रेजी सेना पर आक्रमण किया। आजाद हिंद फौज के पास आधुनिक देशों की तरह युद्ध सामग्री तोप ,बंदूक, बम, वायु सेना इत्यादि सब मौजूद था मगर कम मात्रा में उपलब्ध था।

आजाद हिंद फौज के गठन में कैप्टन मोहन सिंह , रास बिहारी बोस,निरंजन सिंह गिल ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विदेशो में रह रहे भारतीयों के लिए इंडियन इंडिपेंडेंस लीग भी बनाई गई जिसका प्रथम सम्मेलन बैंकॉक में संपन्न हुआ ।

आजाद हिंद फौज के गठन का विचार कैप्टन मोहन सिंह का था।1941 में सुभाष चंद्र बोस ने इंडियन लीग की बर्लिन में स्थापना की।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ही 1943 में रस बिहारी बोस ने टोक्यो की सहायता से इंडियन नेशनल आर्मी INA की स्थापना की थी।जो बाद में चलकर आजाद हिंद फौज के नाम से जानी गई और नेताजी को कमांडर इन चीफ बनाया गया।

21oct 1943 ko सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से उन्होंने सिंगापुर में स्वंत्रत भारत की पहली अस्थाई सरकार आजाद हिंद सरकार  की स्थापना की।अपने इस सरकार में उन्होंने सेनापति प्रधानमंत्री राष्ट्रपति की भूमिका खुद ही निभाई।इनका खुद का अपना राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा था।जल्द ही इस सरकार और  ध्वज को जापान, फिलिपिंस, कोरिया, चीन ,आयरलैंड आदि देशों ने अपनी मान्यता दे दी।जापानी सरकार ने अंडमान निकोबार को नेताजी को सौंप दिया।नेताजी ने इसका नाम क्रमशः शहीद द्वीप और स्वराज द्वीप रखा ।सिंगापुर और रंगून में इन्होंने अपना मुख्यालय बनाया।

6 जुलाई 1944 को उन्होंने रंगून रेडियो स्टेशन से महात्मा गांधी के नाम एक संबोधन प्रसारित किया और आजाद हिन्द फौज की वर्तमान स्थिति को बताया।नेताजी ही ने प्रथम बार महात्मा गांधी के लिए राष्ट्रपिता शब्द का प्रयोग किया।

21 मार्च 1944 को नेताजी ने “दिल्ली चलो “का नारा दिया ।

22 सितंबर को उन्होंने शहीदी दिवस पर साहिदो को याद करते हुआ कहा

       ” हमारी मातृभूमि स्वतन्त्रता की खोज में है। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा। यह स्वतन्त्रता की देवी की माँग है।”

इसी बीच द्वितीय विश्व युद्ध का पासा पलट गया और जर्मनी में हार मान ली और जापान भी पीछे हट गया। जिससे आजाद हिंद फौज को काफी धक्का लगा। नेताजी सुभाष चंद्र बोस टोक्यो की तरफ पलायन कर गए।उनकी आजाद हिंद फौज को गिरफ्तार कर लिया गया तथा उनके अधिकारियों पर दिल्ली के लाल किले में देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया। ऐसा कहा जाता है कि टोक्यो की तरफ जाते समय रास्ते में विमान दुर्घटना के कारण नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु हो गई। जिसकी अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।

 इस तरह आजाद हिंद फौज के कदम रुक गए पर उन्होंने काफी हद तक ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिला दी थी।

नेताजी ने हिटलर के साथ भी काफी वक्त तक काम किया।वे शस्त्र में विश्वास रखते थे।

गांधी जी और नेताजी में कई अवसरों पर मतभेद देखा गया।माना जाता है की गांधी जो को नेताजी के कार्य करने के तरीके नापसंद थे।

नेताजी अक्सर यही कहते थे कि…..

“प्रत्येक वस्तु का कुछ न कुछ मूल्य होता है ….. स्वतंत्रता का अभी पूरा मूल्य हमने नहीं चुकाया है।”

            // जय हिन्द //

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