श्री कालिका पुराण – हिंदी pdf | Shri Kalika Puran Hindi PDF Download

कालिका पुराण

कालिका पुराण

कालिका पुराण को काली पुराण, सती पुराण ,और कालिका तंत्र के नाम से भी जानते हैं। यह एक प्रमुख उप पुराण है ।

ऐसा माना जाता है इसकी रचना असम और कूचबिहार क्षेत्र में ऋषि मार्कंडेय ने की थी ।

इसकी कई सारी पांडुलिपि या प्राप्त हुए हैं जिसमें लगभग 90 अध्याय समाहित हैं।

 इसमें मां काली,माता सती ,माता पार्वती, गौरी शंकर शिव का वर्णन किया गया है।

माता काली शक्ति का ही एक रूप है। हमारे धर्म में 9 तरह की देवियों जो मुख्यतः एक सकती हैं का वर्णन है जो इस तरह से हैं,

“प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।

तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।।

पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।

सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।।

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।

उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ।।”

Kalika Puran

अध्याय व संकलन

कालिका पुराण में कई अलग-अलग अध्याय हैं जो एक विशिष्ट कथा से जुड़े हैं।इसकी शुरुआत में काली पुराण की महिमा कहा वर्णन किया गया है।

इसके कुछ प्रमुख अध्याय इस तरह से हैं ,

  • श्री काली स्वरूप वर्णन
  •  श्री कालिका वर्णन
  • काली स्तुति वर्णन
  • शिव शांता, महामाया, योग,निद्रा जगन्म्यी
  • श्रीहरि द्वारा शिव का अनुनयन
  • सती से विवाह प्रस्ताव
  •  शिव सती विवाह
  •  हिमाद्रि निवास गमन
  •  दक्ष यज्ञ
  • सती देह त्याग
  • दक्ष यज्ञ भंग
  • सती के शरीर के खंड खंड गिरना
  •  शिप्र‌पर्वत व शिप्रा नदी
  • चंद्रमा को श्राप
  • संध्या को गुरु वशिष्ठ द्वारा दीक्षा
  •  नरकासुर उपाख्यान
  • मा कामाख्या देवी वर्णन
  • गौरी परीक्षा
  • महिषासुर उपाख्यान
  •  बेताल भैरव
  • कामरूप पीठ
  • पूजा की अन्य विधियां ,काली स्तुति मंत्र इत्यादि

इसमें माता सती से जुड़े कथाएं महिषासुर नरकासुर राजा दक्ष प्रजापति महिषासुर नरकासुर इत्यादि का वर्णन किया गया है।

शिव  सती विवाह

इसमें माता सती राजा प्रजापति दक्ष के यहां पुत्री के रूप में जन्म लेती हैं। वह समस्त प्रकार के गुणों से सुसज्जित होती हैं ।उन्हें देव ऋषि नारद मुनि ने भगवान शिव की आराधना करने के लिए  कहा। रानी सती बचपन से ही भगवान शिव की पूजा अर्चना करने लगी।

वह धीरे-धीरे बड़ी हुई लेकिन उन्होंने भगवान शिव की पूजा करना बंद नहीं किया। अब वह पहले से भी बहुत ज्यादा पूजा अर्चना करती थी। वह भगवान शिव की आराधना में लीन रहती थी। वह भगवान शिव से विवाह करना चाहती थी। मगर उनके पिता इसके खिलाफ थे। वह अपनी पुत्री सती का विवाह भगवान शिव से नहीं करना चाहते थे ।

काफी दिनों की तपस्या के पश्चात और अन्य देवताओं द्वारा शिव को सती जी विवाह करने के लिए कहने पर भगवान शिव माता सती से विवाह करने के लिए तैयार हो गए। माता सती और भगवान शिव के विवाह में समस्त देवता गण ऋषि महर्षि देवर्षि भूत प्रेत पिचास प्रेत आत्मा सभी सम्मिलित हुए। विवाह पश्चात माता सती भगवान शिव के साथ हिमालय पर रहने के लिए आ गई।

कालिका पुराण

कुछ समय पश्चात प्रजापति दक्ष ने एक यज्ञ का आह्वान किया। जिसमें उन्होंने समस्त देवता गण प्रजा महर्षि मुनि इंद्र ब्रह्मा विष्णु इत्यादि को बुलाया मगर उन्होंने अपने पुत्री सती और अपने जमाता भगवान शिव को नहीं बुलाया। माता सती भगवान शिव से उस यज्ञ में चलने के लिए अनुरोध करने लगी ।

उनके बार-बार अनुरोध करने पर भगवान शिव ने उन्हें जाने के लिए अनुमति दे दी। जब देवी सती अपने पिता के यहां पहुंची। तब उनकी माता के अलावा किसी ने भी उनका स्वागत सत्कार नहीं किया बल्कि इसके विपरीत उनके पिता और उनकी बहनों ने उनका मजाक उड़ाया और अपमानित किया।

प्रजापति दक्ष ने भगवान शिव को बुरी तरह से अपमानित किया तथा उनका तिरस्कार किया। जिससे देवी सती काफी लज्जित हुई तथा उन्होंने यज्ञ की हवन कुंड में कूदकर अपने शरीर को जला दिया जिससे उनकी मृत्यु हो गई।

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कालिका पुराण

देवी सती की मृत्यु की बात सुनकर भगवान शिव की तीसरी नेत्र खुल गई जिससे समस्त संसार में हाहाकार मच गया भगवान शिव क्रोध की पराकाष्ठा पर पहुंच गए। उन्होंने माता सती के मृत शरीर को अपने ऊपर रखकर पूरे ब्रह्मांड में घूमने लगे। उनके गणों ने समस्त संसार में तहस-नहस करना प्रारंभ कर दिया।

भगवान शिव का क्रोध शांत नहीं हो रहा था। तब समस्त देवता गण भगवान विष्णु के पास आते हैं और उनसे भगवान शिव के शांत होने के लिए उपाय पूछते हैं तथा अपने मदद का आवाहन करते हैं। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को कई खंडों में विभाजित कर दिया। वे खंड कई टुकड़ों में कई जगहों पर गिरे जो आज शक्तिपीठ के नाम से जाने जाते हैं यह सब कथा कालिका पुराण में वर्णित है।

माता काली के जन्म की कथा

ऐसा माना जाता है कि एक बार बीज रक्त बीजासुर नाम का एक असुर था।जिसको यह वरदान था कि उसके रक्त की बूंदे जहां-जहां पड़ेंगे वहां से एक नया असुर उत्पन्न हो जाएगे। उसने समस्त संसार में भय व्याप्त कर दिया था ।जिससे देवता काफी डर गए थे।

एक दिन वे ब्रह्मा जी के साथ भगवान विष्णु के पास गए हैं तथा उनसे उस असुर से मुक्त के लिए प्रार्थना की। वे सब भगवान शिव के यहां गए जहां पर भगवान शिव साधना में थे,तब वे माता सती के पास जाते हैं तथा उनसे रक्षा करने को कहते हैं तब माता सती एक विशालकाय रूप धारण करती है।

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उनकी जिह्वा काफी विशाल होती है वह एक हाथ में फरसा धारण करती हैं तथा दूसरी हाथ में रक्त से भरा कटोरा।उन्होंने फिर उस रक्त बीजासुर का संहार किया। असुरों को मारने के पश्चात भी उनका क्रोध शांत नहीं हुआ।उनके रास्ते में जो भी आता था उसका वध कर देती थे।

अब इस नहीं समस्या से देवता गण फिर परेशान हो गए तब उन्होंने भगवान शिव से प्रार्थना की तो भगवान शिव स्वयं माता सती, जो भद्रकाली का रूप धारण कर चुकी थी, के पैरों के नीचे लेट गए भगवान शिव को देखकर माता सती का रौद्र रूप शांत हो गया जो आगे चलकर भद्रकाली के रूप में पूजी जाने लगी।

“एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।

लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥

वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।

वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥”

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