नमक का दरोगा PDF | Namak Ka Daroga by Munshi Premchand PDF Download

Namak Ka Daroga story of Munshi Premchand’s visit to salt is related to various types of taxes on making and selling salt in India. Because of this, all those who were corrupt officials lost their silver. Due to this, all the officers and employees working in the salt department were earning much more than other big departments.

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Book NameNamak ka daroga pdf
AuthorMunshi Premchand
CategoryNovels
No. of Pages9
Size1 MB
LanguageHindi
QualityVery Good
Source / CreditsOwners
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Published/Updated

नमक का दरोगा pdf पुस्तक का सारांश:-

मुंशी प्रेमचंद की यह कहानी नमक का दारोगा Namak Ka Daroga उस काल से संबंधित है जब भारत में नमक बनाने और बेचने पर अनेक प्रकार के टैक्स लगा दिए गए थे। इस कारण से सभी जो भ्रष्ट अधिकारी थे उनकी चांदी हो गई थी। इससे नमक विभाग में काम करने वाले तमाम अधिकारी और कर्मचारी अन्य बड़े विभागों की तुलना में बहुत ही ज्यादा कमाई कर रहे थे।

इस कहानी नमक के दारोगा namak ka daroga कहानी के नायक पात्र मुंशी वंशीधर है जो कि एक निर्धन और गरीब परिवार के सदस्य हैं। और परिवार के इकलौते कमाने वाले व्यक्ति भी  किस्मत से मुंशी वंशीधर को नमक विभाग में एक ऊंचे पद दारोगा के पद पर नौकरी मिल जाती है। 

इसलिए उन्हें अतिरिक्त आमदनी के बहुत से मौके मिलते हैं क्योंकि उस समय भ्रष्ट लोगों के लिए नमक विभाग बहुत ही सही था। लेकिन हमारे मुंह से बंशीधर जी अपने ईमान पर डटे रहते हैं।

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लेकिन एक दिन अचानक ही उन्हें नमक की एक तस्करी के बारे में पता चलता है। तो मुंशी बंशीधर जी वहां तुरंत पहुंच जाते हैं। पता चलता है कि इस तस्करी के पीछे वहां के सबसे बड़े जमींदर अलोपीदीन का हाथ है। इसे पंडित अलोपीदीन भी कहा जाता है । 

पंडित अलोपीदीन बहुत ही निडरता के साथ आता है। क्योंकि उसे लगता है कि पैसे के दम पर कुछ भी काम करवाया जा सकता है। वह मुंशी वंशीधर को हजार रुपए रिश्वत के तौर में देते हैं लेकिन मुंशी जी टस से मस नहीं होते और उन्हें गिरफ्तार करने का हुक्म दे देते हैं। इससे रिश्वत की कीमत बढ़ जाती है और यह कीमत 40000 तक पहुंच जाती है। किंतु फिर भी मुंशी जी का ईमान अदिक रहता है और अंततः पंडित गिरफ्तार हो जाते हैं।

पूरे शहर में पंडित अलोपीदीन की काफी बदनामी और बेज्जती हो जाती है। किंतु इसके बावजूद भी पैसों के दम पर अदालत से बरी हो जाते हैं। और अपने जानकारी से बंशीधर को नौकरी से हटवा हो जाते हैं। उनकी मुसीबतें बढ़ जाती हैं और अपने घर वालों के गुस्से का भी सामना करना पड़ता है।

फिर एक दिन अचानक पंडित अलोपीदीन मुंशीजी के घर आते हैं और उन्हें एक अच्छे वेतनमान वाली नौकरी का प्रस्ताव देते हैं। अलोपीदीन मुंशी वंशीधर की ईमानदारी और सच्चाई से अत्यधिक प्रभावित हुए। इसके लिए उन्हें अपने पूरे व्यवसाय और संपत्ति की देखरेख के लिए मुख्य प्रबंधक अर्थात मैनेजर के पद पर नियुक्त कर दिया।

Summary of Namak Ka Daroga pdf:

This story of Munshi Premchand’s visit to salt is related to various types of taxes on making and selling salt in India. Because of this, all those who were corrupt officials lost their silver. Due to this, all the officers and employees working in the salt department were earning much more than other big departments.

The protagonist of this story, Namak Ke Daroga Story, is Munshi Vanshidhar, a poor and low-income family member. And luckily, Munshi Vanshidhar, the only earning person in the family, gets a job in the salt department at a high post of Inspector. 

So they get many opportunities for extra income because the salt department was very good for corrupt people. But from our mouths, Banshidhar Ji stands firm on his faith.

But one day, suddenly, they come to know about a salt smuggler. So Munshi Vanshidhar Ji reaches there immediately. Behind this smuggling, it is revealed that behind this smuggling is the hand of the most prominent landlord Alopidin. 

It is also called Pandit Alopidin. Pandit Alopidin comes with a lot of fearlessness. Because he feels that anything can be done based on money, he gives thousand rupees to Munshi Vanshidhar as a bribe, but Munshi Ji does not budge and orders to arrest him. 

This increases the bribe price, and this price reaches up to 40000. But still, the faith of Munshi Ji remains high, and eventually, the Pandit gets arrested.

Pandit Alopidin gets a lot of defamation and humiliation all over the city. But despite this, they are acquitted by the court based on money. And with his knowledge, Banshidhar gets fired from his job. Their troubles increase, and they also have to face the anger of their family members.

Then one day, suddenly, Pandit Alopidin comes to Munshiji’s house and offers him a good-paying job. Alopidin was highly impressed by the honesty and truthfulness of Munshi Vanshidhar. He was appointed Chief Manager, i.e., manager, to look after his entire business and property.

Namak Ka Daroga Pustak ke kuch ansh:-

जब नमक का नया विभाग बना और ईश्वर के द्वारा दी गई इस अनमोल भेंट के व्यवहार करने का निश्चित हो गया तो लोग चोरी-छिपे इसका व्यापार करने लगे। अनेक प्रकार के छल प्रपंच षड्यंत्रों का सूत्रपात हुआ। 

कोई गुस्से काम निकालता था तो कोई कैसे ही। इससे अधिकारियों के तो मौज थी। पटवारी गिरी का सर्व सम्मानित पद छोड़ छोड़ कर लोग इस नए विभाग की वर्क अंदाजी करते थे। इसके दरोगा पद के लिए तो वकीलों के मन में भी लालच आने लग गया था

यह उस दौर की बात है जब अंग्रेजी शिक्षा और ईसाई मत को लोग एक ही सिक्के के दो पहलू मानते थे। फारसी का बाहुल्य था। प्रेम की कथाएं और श्रृंगार रस के काव्य पढ़कर फारसी लोग सर्वोच्च पद पर अपना स्थान प्राप्त कर लेते थे।

मुंशी वंशीधर जी भी जुलेखा की विरह कथा समाप्त करके सीरी और फरहाद के प्रेम कहानी को नल और नील की लड़ाई तथा अमेरिका के आविष्कार से अधिक महत्व की बातें समझते हुए रोजगार की खोज में निकल पड़े।

उनके पिता एक अत्यंत ही अनुभवी और समझदार पुरुष थे। 

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वह समझाने लगे कि देखो बेटा घर की हालत देख रहे हो कर्जे के बोझ से दबे हुए हैं। लड़कियां हैं जो दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है अर्थात जवान हो रही है। मैं कगारे पर का वृक्ष हो रहा हूं ना मालूम कब चला जाऊ। अब तुम ही घर के मालिक अथवा मुख्तार हो।

नौकरी में पद की तरफ बिल्कुल ध्यान मत देना यह तो पीर का मजार है। निगाहें चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए। हमेशा ऐसा काम ढूंढना जहां में ऊपर की आय भी शामिल हो तथा कुछ कमाई ऊपर से भी हो। मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चांद है जो एक ही दिन दिखाई देता है और महीने के अंत तक घटते घटते लुप्त हो जाता है। ऊपरी आय बहता हुआ स्त्रोत है, जिससे सदैव प्यास बुझती रहती है। 

वेतन मनुष्य देता है इसी से उसमें वृद्धि नहीं होती और ऊपरी आमदनी भगवान की देन है। इससे उसकी बरकत होती है बाकी तुम खुद बुद्धिमान हो तो मैं और क्या समझाऊं।

इस मामले में बुद्धिमता की बड़ी आवश्यकता है मनुष्य को देख।उसकी आवश्यकताओं को देखो समझो और अवसर को देखो। और उसके उपरांत तुम्हें जो कुछ भी ठीक लगे करो। गरज वाले आदमी के साथ कठोरता करने में ही लाभ ही लाभ है। लेकिन बेगृज को दांव पर पाना जरा मुश्किल होता है इन बातों को निगाह में बांध लो यह मेरी उम्र भर की कमाई है।

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