नमक का दरोगा – मुंशी प्रेमचंद की कहानी PDF Download | Namak Ka Daroga by Munshi Premchand PDF Download

नमक का दरोगा

नमक का दरोगा

यह कहानी हमें कर्मों के फल के महत्व के बारे में बताती है। यह कहानी हमें बताती हैं कि बुराई कितनी ही बड़ी क्यों न हो आखिरकार अच्छाई उसे हरा ही देती है।

भ्रष्ट आचरण लोगों के मन में ऊंचे ओहदे पर पहुंचने के बाद भी बना रहता है। ऊपरी कमाई का लालच ही व्यक्ति को भ्रष्ट बनाता है।

इसी भ्रष्ट मानसिकता को लेखक ने बड़े ही साहसिक तरीके से प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था में दिखाया है।

पुस्तक : नमक का दरोगा 

लेखक   : मुंशी  प्रेमचंद 

पुस्तक की भाषा : हिंदी 

पेज :  9 

ये कहानी आज़ादी के पहले के टाइम की है। अंग्रेजी सरकार ने नमक पर अपना एकाधिकार जताने के लिए अलग नमक विभाग बना दिया।

नमक विभाग के बाद लोगों ने टैक्स से बचने के लिए नमक का चोरी छुपे व्यापार भी करने लगे थे जिसके कारण भ्रष्टाचार भी फैलने लगा था। कोई रिश्वत देकर अपना काम निकलवाता तो कोई चालाकी और होशियारी से अपना काम निकलवाता था।

नमक विभाग में काम करने वाले अधिकारी लोगों की कमाई तो अचानक से कई गुना बढ़ गई थी। अधिकतर लोग इस विभाग में काम करने के लिए तत्पर रहते थे क्योंकि इसमें ऊपर की कमाई अच्छी खासी हो जाया करती थी।

लेखक कहते हैं कि उस दौर में लोग महत्वपूर्ण विषयों की जगह प्रेम कहानियों व श्रृंगार रस के काव्यों को पढ़कर भी बड़ी बड़ी नौकरी पा लेते थे।

नमक का दरोगा – मुंशी प्रेमचंद की कहानी

मुंशी वंशीधर उसी दौरान नौकरी की तलाश में थे। उनके पिता को अच्छा खासा अनुभव भी था। उन्होंने अपनी वृद्धावस्था का हवाला देकर ऊपरी कमाई वाले पद को अच्छा बताया।

वे कहते हैं कि मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चांद है जो कि एक दिन दिखाई देता है और धीरे धीरे घटकर लुप्त हो जाता है।

जबकि ऊपरी आय एक बहते हुआ समुंद्र की तरह है जिससे हमेशा प्यास बुझती है। वह अपने पिता से आशीर्वाद लेकर नौकरी की तलाश कर रहे होते है और किस्मत से उन्हें नमक विभाग में नौकरी मिल जाती है जिसमें ऊपरी कमाई अच्छे से हो जाती है ये बात जब पिताजी को पता चली तो वो बहुत खुश हुए।

छ: महीने अपने कार्य को सही से करने के कारण अफसरों को उन्होंने काफी प्रभावित किया। ठंड के मौसम में वंशीधर दफ्तर में सो रहे थे। यमुना नदी पर बने नाव के पुल से गाड़ियों का शोर शराबा सुनकर वे नींद से उठ गए।

यमुना नदी पर बने नावों के पुल से गाड़ियों की आवाज सुनकर वे उठ गए। पंडित अलोपीदान इलाके के प्रतिष्ठित जमींदार थे। जब जांच की तो पता चला कि गाड़ी में नमक के थैले पड़े हुए हैं। पडित ने वंशीधर को रिश्वत ले कर गाड़ी छोड़ने को का लेकिन उन्होंने साफ़ मन कर दिया। पंडित जी को गिरफ्तार कर लिया गया। 

अगले दिन गिरफ्तारी की खबर आग की तरह फैल गयी थी। फिर अलोपीदीन को कोर्ट में लाया गया। लज्जा के कारण उसकी गर्दन शर्म से झुक गई। सारे वकील और गवाह उनके पक्ष में थे लेकिन वंशीधर के पास केवल सत्य था। पंडितजी को सबूतों न होने के कारण रिहा कर दिया।

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बाहर आकर पंडित जी ने पैसे बांटे और फिर क्या था वंशीधर को व्यंगयबाण का सामना करना पड़ा एक हफ्ते के अंदर ही उन्हें सजा के तौर पर नौकरी से हटा दिया गया। संध्या का समय था। पिता जी राम-राम की माला जप रहे थे तभी पंडित जी रथ पर झुक कर उन्हें प्रणाम किया और उनकी चापलूसी करने लगे और अपने बेटे को भलाबुरा कहा।

नमक का दरोगा – मुंशी प्रेमचंद की कहानी

उन्होने कहा मैंने कितने अधिकारियो को पैसो के बल पर खरीदा है लेकिन ऐसा कर्तव्यनिष्ठ नहीं देखा पंडित जी वंशीधर की कर्तव्यनिष्ठा के कायल हो गए। वंशीधर ने पंण्डित जी को देखकर उनका सम्मानपूर्वक आदर सत्कार करा।

उन्हें लगा कि पंडितजी उन्हें लज्जित करने आए हैं। लेकिन उनकी बात सुनकर आश्चर्यचकित हो गए और उन्होंने कहा जो पंडितजी कहेंगे वही करूंगा। पंडितजी ने स्टाम्प वाला एक पत्र दिया जिसमें लिखा था वंशीधर उनकी सारी स्थाई जमीन के मैनेजर बनाए जा रहे हैं।

वंशीधर की आंखों में आंसू आ गए और उन्होंने का वो इस पद के काबिल नहीं है। पंडित जी ने कहा मुझे न काबिल व्यक्ति ही चाहिए जो धर्मनिष्ठा से काम करे।

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