श्रीमद्भागवत गीता,पृष्ठभूमि,18 पर्व या अध्याय

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि।।

उपर्युक्त पंक्ति जो की श्रीमद् भगवत गीता से ली गई है जिसमे श्री कृष्ण अर्जुन से बताते है की हे पार्थ ; ” इंसान को केवल कर्म का ही अधिकार है, उसके फल के बारे में चिंता करने का नहीं। इसलिए तुम कर्मों के फल की चिंता मत कर और कर्म से विमुख मत हो। “

आज हम बात कर रहे है श्रीमद्भागवत गीता कि जो हिंदू धर्म के प्रमुख ग्रंथों में से एक है इसकी गणना प्रस्थानत्रयी में की जाती है यानी कि गीता का हिंदू धर्म में वही स्थान है जोकि उपनिषदों और धर्म सूत्रों का है। अगर हम अपनी उपनिषदों को गौ मतलब की गाय की संज्ञा देते हैं तो गीता निश्चय ही उसके दूध के समान है।

श्रीमद् भागवत गीता कुरुक्षेत्र में कौरवों और पांडवों के बीच होने वाले युद्ध के पहले दिन उसे श्री कृष्ण और अर्जुन के बीच के संवादों का संकलन है। इसे महाभारत के भीष्म पर्व से लिया गया है इसमें कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं और उन्हें ज्ञान देते हैं।

रचनाकार 

ऐसा माना जाता है की वेदव्यास ने महाभारत की रचना की थी जिसमें गीता का भी संकलन है । ऐसी किवदंती हैं की वेदव्यास ने गणेश जी की मदद से लगभग 3 वर्षों में महाभारत की रचना की थी।

लोग ऐसा कहते हैं कि जब वेदव्यास ने मन ही मन में महाभारत की रचना की तब उन्होंने  सोचा की किसी ऐसे व्यक्ति को ढूंढा जाए जो बिना किसी गलती के और शीघ्र ही इसी लिखने में मदद करें जिससे यह समस्त संसार में लोगों के पास पहुंचे तब उन्होंने श्री गणेश जी के पास अनुरोध करने पहुंचे ।

श्री गणेश जी ने कहा कि मैं लिखते समय रुकूंगा नहीं जब तक किया खत्म नहीं होगा तब वेदव्यास जी ने यह शर्त रखी की आपको श्लोक सुनने के बाद उसको समझना भी पड़ेगा तब तभी मैं अगले श्लोक बोलूंगा फ्श्री गणेश जी ने यह शर्त मान ली । इस लोक श्लोक लिखते समय वेदव्यास जी बीच-बीच में कठिन श्लोक बोल देते थे जिसको समझने में गणेश जी कुछ समय लगाते थे, उस समय में वेदव्यास जे जी नए श्लोक की रचना कर लेते थे।

महाभारत

महाभारत की रचना वेदव्यास ने की थी। यह एक काव्य ग्रंथ है। महाभारत विश्व का सबसे लंबा साहित्यिक ग्रंथ है। इसमें 1,10,000 से भी अधिक श्लोक संकलित हैं जोकि मुख्यतः 18 पर्वो में विभाजित है।

इसे जय संहिता, भारत ,मह् भारत इत्यादि नामों से भी जानते हैं।

              18 पर्व

1.     आदि पर्व

2.     सभा पर्व

3.     अरण्य पर्व

4.     विराट पर्व

5.     उद्योग पर्व

6.     भीष्म पर्व

7.     द्रोण पर्व

8.     कर्ण पर्व

9.     शल्य पर्व

10.  सौतिक पर्व

11.  स्त्री पर्व

12.  शांति पर्व

13.  अनुशासन पर्व

14.  अश्वमेधिका पर्व

15.  आश्रम्वासिका  पर्व

16.  मौसुल पर्व

17.  महाप्रस्थानि पर्व

18.  स्वर्गारोहण पर्व

                  हरिवंश पर्व

श्रीमद्भागवत गीता के बारे में

इसमें मुख्यता कर्म ज्ञान व मोक्ष के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है।

इसमे कुल 700 श्लोक है जो कि ‌18 अध्ययो में विस्तृत है। ऐसा माना जाता है कि महाभारत में 18 दिन तक युद्ध चलता रहा था, इसलिए इसमें मुख्यता 18 पर्व है।

पृष्ठभूमि

इसकी शुरुआत तब होती है जब कौरव और पांडवों की सेना कुरुक्षेत्र में एक दूसरे के सामने होती है। तब अर्जुन अपने रथ पर सवार होकर युद्ध भूमि में आते हैं और उन्हें  दुःख ग्लानि होती है की, उन्हें अपने स्वजनों ,भाई, तात आदि से युद्ध लड़ना पड़ेगा। तब वे विलाप और बेचैन हो जाते हैं। तब उनके साथी संसार के पालनहार यानी कि श्री कृष्ण जोकि इसमें उनके युद्ध के रथ के सारथी बने हुए हैं,उन्हें समझाते हैं की यह धर्म क्षेत्र है।तुम मोह को त्यागो और कर्म करो बिना फल की चिंता करे बगैर। यहीं से गीता की उत्पत्ति होती है।

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18 पर्व या अध्याय

  • प्रथम पर्व : अर्जुन विषाद योग
  • द्वितीय पर्व :साख्य योग
  •  तृतीय पर्व: कर्म योग
  • चतुर्थ पर्व :  ज्ञान पर्व  संन्यास योग 

  इसमें मिथ्याचार का वर्णन है।

इसमें श्री कृष्ण कहते है मैने पहले भी कई जन्म ले लिया है और तुमने भी ।

वे कहते है की

 “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदात्मानम् सृजाम्यहम्।।”

“परिट्र्णाय साधूनां विनाशाय च द्रष्कृताम।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।”

  •   पांचवा पर्व :कर्म संन्यास योग

       इसमें श्री कृष्ण कहते है कि मैं सभी प्राणियों में हूं । अत: सभी को समदर्शी होना चाहिए ।वो कहते है ,

  विद्याविनयसंपने ब्रह्मने, गवि, हस्तिनी।

शुनि चैव श्व्याके च पंडिताः समदर्शिनः।।

  • छटा पर्व :आत्म संयम योग
  • सातवा पर्व :ज्ञान विज्ञान योग
  • अठवा पर्व : ब्रह्मयोग
  • नौवां पर्व : राजगुह्य योग
  • दसवां पर्व : विभूतियोग 

इसमें श्री कहते बताते है की इस जगत में जितने भी देवता है वो सभी एक ही भगवान , नर या नारायण की विभूतिया है। मनुष्य के सभी तरह के गुण अवगुण भगवान के ही विभिन्न शक्तियों के रूप है ।

“सर्वभूतानी कौंतय प्रकृतिम यान्ति मामिकम।

कल्पवृक्षे पुन: स्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्।।

  • ग्यारहवा पर्व :विश्वरूप दर्शन 

इसमें श्री कृष्ण भगवान अपना विराट रूप अर्जुन को दिखाते है जिसमे वो विष्णु भगवान के चतुर्भुज रूप होते है ।

 इत्यादि ।

अन्य पर्व में मनुष्य के गुणों के बारे में विस्तार से बताया गया है जैसे की सत्व रज व तम । आगे श्री कृष्ण कहते है कि इस विश्व का निर्माण दैवी और आसुरी शक्तियों के मेल से हुई है ।जैसे की अगर प्रकाश है तो अंधकार भी होगा और अस्त हुआ है तो उदय भी होगा ।

श्री कृष्ण कहते है हमे सभी तरह की चिंतायो को त्यागकर सिर्फ और सिर्फ अपने कर्म को करते रहना चाहिए ।

इसमें बताया गया है की कैसे आत्मा अजर अमर है ।आत्म कभी मरती नहीं है वाह सिर्फ अपना रूप बदलती है जैसे हम पुराने कपड़े बदलकर नए कपड़े पहनते है वैसे ही आत्मा जीव की मृत्यु के बाद एक नया शरीर को धारण कर लेती है ।

इस संसार रूपी मायानगरी में कोई अपना पराया नही है । हमे किसी का भी लोभ मोह माया नही होना चाहिए ।

इसमें श्री कृष्ण बताते है की आहार तीन तरह के होते है । हमे कब किस तरह का भोजन करना चाहिए ।।

गीता पर भाष्य

ऐसे ग्रंथ जो किसी अन्य ग्रंथ की वृहद व्याख्या या टीका करते है उन्हे हम भाष्य के नाम से जानते है ।

गीता पर भी कई विद्यानो ने कई सारी टिकाए की है जिनमे कुछ प्रमुख इस प्रकार है ,।

गीताभाष्य : आदिगुरु शंकराचार्य

गीताभास्य :रामानुजाचार्य

आधुनिक समय की बात करे तो कई विद्यानों ने इस दिशा में अपनी पुस्तकों जन मानस तक पहुंचाई जैसे की ,

 गीतारहस्य : बाल गंगाधर तिलक

अनासक्ति योग : महात्मा गांधी

गीता प्रवचन : विनोवा भावे

वर्तमान स्थिति

आज इसकी पवित्रता को ध्यान में रखते हुए उसे अदालतों में एक संकल्प और पवित्र पुस्तक के रूप में देखते हुए इसकी शपथ दिलाई जाती है । गीता में हमारे सभी पहलुयो का विस्तार से वर्णन है ।

हालांकि इसका प्रचलन 18 शताब्दी के बाद से ज्यादा हुई ।और धीरे धीरे यह सभी जनमानस में फैल गई है । इसका स्थान सनातन धर्म में सबसे ऊपर है ।

आज गीता प्रेस गोरखपुर  इसके प्रकाशन और वितरण में एक अभूतपूर्व जिम्मेदारी निभा रही है ।इसपर कर टीवी सीरियल भी बने है और लगातार बन रहे है जिससे आम जनता तक इनको पहुंचाया जा सके ।

अनुवाद:

इसको कर भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है ताकि यह विश्व भर में पहुंच सके ।

निष्कर्ष:

हमे बिना भविष्य की चिन्ता किए बगैर अपने वर्तमान के बारे में जीना चाहिए । किसी से भी ईर्ष्या,मोह ,द्वेष ,जलन ही हमारे दुखो का कारण है ।संतोष, निश्वार्थ कर्म ही सुखी जीवन का सबसे मजबूत पहिया है । आत्मा कभी भी मरती नही है अतः हमे मृत्यु का शोक नही करना चाहिए क्यूंकि मृत्यु अंत भी बल्कि नए निर्माण का प्रतीक है ।

और भी कई तरह के तमाम जीवन के गूढ़ रहस्य के बारे में गीता में विस्तार से चर्चा की गई है ।जैसे की ब्रह्म की उत्पति , जीव का चक्र , संख्य दर्शन , मोक्ष अध्यात्म, जीवन मृत्यु की लीला ।

अतः हमे एक बार कम से कम गीता का पाठ अवश्य करना चाहिए क्यूंकि इसमें कई बार कई जगह हमारे दैनिक परेशानियों, चिंतायों,अवरोधों ,विकारों ,गुणों सद्गुणों के बारे में विस्तार से वर्णन है ।

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