पतंजलि योग सूत्र patanjali yoga sutras pdf download free

According to the belief of patanjali yoga sutras yoga patanjali yoga sutras pdf, nature and the conscious person are two different types of elements. Those who are eternal, that is, those who have no beginning. The whole world has been created by the combination of these two. There are 3 gunas in nature, sattva, raja and tamas. When consciousness meets with it, then there is movement in it and from this the creation of the universe begins.
This Prakriti is the ‘Visual’ and the Purusha is the ‘Seeer’. Nature is visible all around in this whole world and Purusha is nowhere to be seen. But every work of nature is possible only due to the predominance of that Purusha element. These two are linked in such a way that it is very difficult to distinguish them and the main reason for this is ignorance.

Purusha is omniscient and being absorbed in every particle of nature, it also becomes omnipresent. The soul is also a result of the cooperation of these two, that person is also called the soul in the body and the world soul in this institution or creation.

पतंजलि योग सूत्र योग patanjali yoga sutras pdf की मान्यता के अनुसार प्रकृति तथा चेतन पुरुष दो विभिन्न प्रकार के तत्व है। जो अनादि हैं, यानी जिनका कोई भी प्रारंभ नहीं है। इन दोनों के ही संयोग से समस्त संसार का निर्माण हुआ है। प्रकृति में 3 गुण है सत्त्व रज तथा तमस। इसके साथ जब चेतना मिलती है तब उसमें हलचल होती है और इससे सृष्टि का निर्माण आरंभ होता है।

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यही प्रकृति ‘दृश्य’ है तथा पुरुष ‘दृष्टा’ है। इस पूरे संसार में चारों और प्रकृति ही दिखाई देती है और पुरुष कहीं भी दिखाई नहीं देता। किंतु प्रकृति का हर कार्य उस पुरुष तत्व की प्रधानता से ही संभव हो पा रहा है। यह दोनों इस प्रकार से जुड़ गए हैं कि इन्हें अलग-अलग पहचानना बहुत ही कठिन है और इसका मुख्य कारण अविद्या है। 

पुरुष सर्वज्ञ है तथा प्रकृति के हर कण में समाहित होने के कारण यह सर्वव्यापी भी हो जाता है। जीव भी इन दोनों की ही सहयोग का एक परिणाम है उस पुरुष को शरीर में आत्मा तथा इस संस्था अथवा सृष्टि में विश्वात्मा भी कहा जाता है।

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पतंजलि योग सूत्र पुस्तक के बारे में about patanjali yoga sutras pdf in hindi-

 

इस पुस्तक के लेखक का नामश्री नंदलाल दशोरा है, यह रणधीर प्रकाशन हरिद्वार से प्रकाशित हुई है, इसके वितरक रणधीर बुक सेल्स हैं, मुद्रक राजा ऑफसेट प्रिंटर|

 

व्याख्या कार श्री नंदलाल दशोरा
प्रकाशक रणधीर प्रकाशन
लेखक श्री नंदलाल दशोरा
पृष्ठों की संख्या 249
ebook का साइज 3.4 MB

 

पतंजलि योग सूत्र की विषय सूची 

 

पतंजलि योग सूत्र patanjali yoga sutras pdf में 4 खंड है:-

  1. समाधि पाद 
  2. साधन पाद 
  3. विभूति पाद 
  4. कैवल्य पाद

 

समाधि पाद-

इस पुस्तक के इस खंड में योग शास्त्र का आरंभ और इसके लक्षण, चित् की व्रतियों के भेद और उसके लक्षण, चित्त की वृत्तियों का विरोध, समाधि का वर्णन, ईश्वर प्राणी धान का महत्व चित् के विक्षेप और उसको दूर करने के उपाय, मन को स्थिर करने के विभिन्न उपाय, समाधि के अन्य भेद एवं उनके विभिन्न प्रकार के फल बताए गए हैं।

 

साधन पाद

साधन पाद खंड में क्रिया रोग का स्वरूप और उसके अनेक फल अविद्या इत्यादि प्रकार के पांच क्लेश क्लेश ओं के नाश का उपाय दृश्य और दृष्टा का स्वरूप प्रकृति एवं पुरुष का मिलन योग के आठ अंगों का वर्णन किया गया है।

 

विभूति पाद-

पुस्तक के इस खंड में धारणा ध्यान समाधि का वर्णन संयम का निरूपण मन के परिणामों का विषय प्रकृति दैनिक पदार्थों के विभिन्न परिणाम निम्न विषयों में संयम करने के अनेकों परिणाम विवेक ज्ञान और केवल ले के बारे में चर्चा की गई है।

 

कैवल्य पाद-

इसमें सिद्धि प्राप्ति के हेतु तथा जत्ती अंतर परिणाम संस्कारों की शून्यता वासनाएं और उनका स्वरूप गुणों का वर्णन चित् का वर्णन धर्म मेघ समाधि और केवल व्यवस्था के बारे में बताया गया है।

 

पतंजलि योग सूत्र के बारे में इसके अनुवादक के कुछ शब्द-

A few words from its translator about the Patanjali Yoga Sutras pdf in hindi

यह patanjali yoga sutras pdf योग दर्शन स्वयं अपने आप में संपूर्ण सार्वभौमिक एवं पूर्णता वैज्ञानिक है। इसमें ना ही संप्रदाय की गंध आती है और ना ही धार्मिक संकीर्णता का अनुभव होता है। इसका प्रयोग देश काल धर्म जाति लिंग इत्यादि विभिन्न प्रकार की चिंताओं को ध्यान में रखें बिना ही किया जा सकता है। यह मानव जाति की एक अमूल्य धरोहर है। 

 

किंतु इसके साधकों को इस बात का विचार हमेशा रखना चाहिए कि जिस प्रकार तैरना सीखने के लिए किसी पुस्तक के ज्ञान से काम नहीं चलता, उसके लिए तो पानी में कूदना ही पड़ता है। ठीक उसी प्रकार किसी भी ग्रंथ को पढ़ लेने भर से आत्मा का ज्ञान नहीं होता और बिना आत्मज्ञान के मुक्ति मिलना असंभव है। इस ज्ञान को किसी गुरु के मार्गदर्शन में स्वयं ही प्राप्त करना पड़ता है। सभी प्रकार के ग्रंथ केवल हमें केवल मार्ग ही दिखा सकते हैं चलना तो हमें स्वयं को ही पड़ेगा। 

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इसी प्रकार इस ग्रंथ में भी दिखाया गया मार्ग अपने आप में पूर्ण तो अवश्य है किंतु मानना हमें स्वयं को भी पड़ेगा। 

जो इसके अनुसार बढ़ता है, उसको इसका पूर्ण फल या दूसरे शब्दों में कहें तो अंतिम फल मोक्ष की प्राप्ति अवश्य होती है।

 

इस ग्रंथ की व्याख्या का उद्देश्य सामान्य लोगों में योग साधना के प्रति उनकी रुचि को जागृत करना है और यह सुनिश्चित करना है कि वे किस के मार्ग पर चलने को तत्पर हो। इसीलिए इस ग्रंथ में शाब्दिक अर्थों पर अधिक जोर न देखकर उसे पाठ्यपुस्तक बनाने की अपेक्षा भावों को ज्यादा प्रधानता दी गई है, जिससे यह कठिन विषय भी सरल प्रतीत हो।

 

अंत में मैं उन सभी का आभारी हूं जिनकी ज्ञात अज्ञात प्रेरणा और अद्भुत मार्गदर्शन से ग्रंथ को पूर्ण करने में मुझे बहुत सहायता प्राप्त हुई है।

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