Chhabila Rangbaaz ka Shahar By Pravin Kumar In Hindi PDF Free Download

Chhabila Rangbaaz ka Shahar By Pravin Kumar In Hindi PDF Free Download छबीला रंगबाज का शहर मुख्यतः 4 लघु कथाएं का संकलन है । जिनमें कई सारे किरदार,विषय और उनकी पृष्ठभूमि है। इन सभी कहानियों को लिखने में लगभग 7 वर्षों का समय लगा।यह एक तरह से काल्पनिक हैं। फिर भी इसमें जीवन व समाज के संबंधों को नजदीक से चित्रित किया गया है।

Chhabila Rangbaaz ka Shahar By Pravin Kumar
Chhabila Rangbaaz ka Shahar By Pravin Kumar

लेखक : प्रवीण कुमार 

पुस्तक की भाषा : हिंदी 

पेज : 147

प्रवीण कुमार

युवा कहानीकार प्रवीण कुमार ने कई लेखों व पुस्तकें के माध्यम से आज एक उभरते हुए लेखक के रूप में अपनी जगह सुनिश्चित की है।इनकी इतिहास और साहित्य में विशेष रूचि है। यह दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक कॉलेज में हिंदी के सहायक प्रोफेसर के रूप में भी कार्यरत हैं।इन्होंने कई पुस्तकें लिखी हैं जैसे कि,

  • कुली लाइंस
  • वास्कोडिगामा की साइकिल

इस पुस्तक की 4 कहानियां

  • छबीला रंगबाज का शहर
  • लादेन ओझा की हसरतें
  • नया ज़फरनामा
  • चिल्लैक्स लीलाधारी

Chhabila Rangbaaz ka Shahar By Pravin Kumar इन कहानियों में छोटे,बड़े और मध्यम सभी तरह के कस्बों और शहरों के वास्तविक परिवेश को चित्रित किया गया है। उनके विशिष्ट पहचान,कार्यकलाप,दैनिक जीवन व उनके बीच के लोगों के बीच व्याप्त व उत्पन्न सांस्कृतिक लगाव, मतभेदों, ऊंच नीच,जात पात, धर्म कर्म  को बखूबी चित्रण किया गया है।

इसमें देहाती ग्रामीण शब्दों का काफी उपयोग किया गया है। जो पाठकों को कहानी से जोड़े रखता है।उन्हें आत्मीयता का बोध कराता है। तथा कहानी की पृष्ठभूमि से हटने नहीं देता।

Chhabila Rangbaaz ka Shahar By Pravin Kumar

Chhabila Rangbaaz ka Shahar By Pravin Kumar इसमें एक युवक ट्रेन से एक कस्बे में स्थित रेलवे स्टेशन पर उतरता है ,लगभग सुबह सुबह। उतरने के बाद वह स्टेशन के दृश्यों को काफी ध्यान से देखता है, वहा पर उसे किसी भी तरह की कोई चहल पहल नजर नहीं आती है ।

वहां पर चारों तरफ लोग ही लोग अधजगे, अलसाये व शांत अवस्था में लेटे हैं ,किसी को किसी से कुछ लेना देना नहीं है। स्टेशन पर उपस्थित चाय वालों,ठेले वालों, स्टाल वाले, कुलियों में किसी भी तरह की कोई उत्साह या जल्दबाजी नहीं है ।  तभी वह लेटे हुए हैं कई लोगों को पार करने के बाद अचानक एक व्यक्ति से टकरा जाता है,जो अभी-अभी ट्रेन की तीव्र गति के हार्न के बजने के कारण उठ जाता है।

आगे बढ़ने पर वह एक घड़ी वाले से समय पूछता है,

, “भाई साहब! टाइम क्या हो

रहा है?”

 पता नही।कैसे उस काया को गुस्सा आ गया, उसने अपने होंठों के कोर में फँसे पान की पीक को अपनी कानी उँगली से पोछा और अजीब ढंग से आँखेतरेर दिया फिर पूछने वाले की ओर घूरते हुए उसने आसमान की ओर अपना मुँह उठा दिया और बोला,

“घड़िया खरीदने में…चंदा दिये ठे का ?”

“?”, “ऐं।”

पूछने वाले के होंठ खिंच गये।

 “हंह…” कहकर युवा घड़ीबाज़ चल पड़ा। चलते-चलते पान की पीक टाइम पूछने वाले के जूते के पास की सूखी धरती को समर्पित करता गया,

‘पिच्….,।’

आगे बताता है कि” देखने में ई शहर है ,महसूस करने में  सामंत।”

आगे की कहानियों में एक जगह ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद होने वाले हैं चौराहे पर चर्चा पर वर्णन है जिसमें एक बार किसी ने ओसामा बिन लादेन के बाद लादेन जी शब्द का प्रयोग कर लिया था जिसके वजह से काफी बवाल हुआ।

छबीला रंगबाज़ का शहर एक जगह कई मित्र होते हैं जो अलग-अलग धर्मों के हैं ।एक दिन अल्फ्रेड ने अपने टिफिन में आमलेट लाया। जैसे ही उसने टिफिन खोला तब हिंदू मित्र ने कहा, छी: छी: तुम विद्या देवी के साथ आमलेट लाते हो। तब अल्फ्रेड बोलता है कि हमारे में कोई विद्या की देवी नहीं होती है।

इसमें हिंदू -मुस्लिम के बीच होने वाले हैं मत भेदों , लगाव, सौहार्द को भी बखूबी प्रस्तुत किया गया है।किस तरह से उनके बीच छिटपुट मुद्दों पर आए दिन बहस, तर्क वितर्क और छोटी मोटी गुटबंदी होती रहती है, इसको भी उचित सन्दर्भों के माध्यम से लिखा है।

सफलता की प्रसन्नता – हिंदी PDF Download

Chhabila Rangbaaz ka Shahar By Pravin Kumar

छबीला रंगबाज़ का शहर साठोत्तरी पीढ़ी के कहानीकार, उपन्यासकार,संस्मरण लेखक ,बीएचयू में हिंदी के प्रोफेसर,साहित्य अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत( रेहन व रग्घू के लिए) वरिष्ठ लेखक काशीनाथ सिंह ने इसकी काफी सराहना की है वे कहते हैं कि उन्होंने कहा कि,

” दूसरे शहर झक मारे बिहार के इस अलबेले छबीला रंगबाज के शहर के आगे इसे लंबी कहानी कहूं या लघु उपन्यास – जितना ही जबरदस्त है उतना ही मस्त।”

आजकल की अन्य हिंदी कहानियों की भांति इसमें भी कहने को कुछ नहीं है लेकिन दिखाने के लिए पूरा दृश्य मौजूद है

यह नई हिंदी के पाठको के लिए कई मुद्दों को ध्यान में रखके लिखी हुई है।

पढ़ने के बाद हमें मालूम चलता है कि हममें से हर आदमी मे एक रंगबाज है।

युवा लेखक प्रवीण कुमार की इन रचनाओं में छोटे बड़े शहरों कस्बों की जिंदगी के हर पहलू वहां के बोली, भाषा, पहनावे ,खानपान ,व्यवहार के ढंग आदि सभी को बहुत बारीकी से उकेरा है । इसे इतना रोचनीय व मंझे तरीके से लिखा गया है कि छबीला रंगबाज एक यादगार किरदार बन जाता है।

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